दीवाली पर लक्ष्मी माता का वार्षिक निरीक्षण होना है। इसका संदेश सर्वसंबंधित को प्रसारित कर दिया गया। इस पर बकायदा रूट-चार्ट जारी किया गया कि लक्ष्मी स्पेशल अपने होम स्टेशन से अमावस्या की काली रात को फलां बजे प्रस्थान करेगी और कब-कब कहां-कहां पहुंचेगी। इस निरीक्षण स्पेशल में लक्ष्मी माता अपने सेकेट्री मि. उल्लू जी एवं गणेश भगवान अपने सेकेट्री मि. चूहे जी सहित प्रमुख विभागों के देवी-देवता भी रहेंगे। उनकी आवभगत कैसे करनी है, यह अंडरस्टुड रहेगा।
यह संदेश प्रसारित होते ही लोगों में खलबली सी मच गई। निरीक्षण के एक माह पूर्व से ही लोग अपने-अपने घरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन कराने में जुट गए। जो ज्यादा सार्मथ्यवान थे, उन्होंने ठेकेदारों को बुलाकर इस कार्य का ठेका दे दिया। ठेकेदार महोदय भी संबंधित दुकानदारों से तय-तमाम (मेरा आशय कमीशन तय करने से है) करके मंहगा डिस्टेम्पर लगवाया। जो थोड़ा कम सार्मथ्यवान थे, उनका घर कम दाम वाले डिस्टेम्पर से चमकाया गया। जो उनसे भी गरीब थे, उन्होंने अपना घर समोशन से पुतवाया। जो एकदम गरीब थे, वे खुद ही कूंची लेकर अपना-अपना घर चूने से पोतने में जुट गए। गांव में जिनके घर कच्चे थे तथा मिट्टी से बने थे, वे गाय-भैंस की पोटी (मेरा आशय गोबर से है) से ही लिपायी करने में जुट गए। सभी का एक ही उद्देश्य- लक्ष्मी माता के वार्षिक निरीक्षण में अपना घर साफ-सुथरा दिखाना, जिससे कि लक्ष्मी माता प्रसन्न होकर उनको पुरस्कार स्वरूप कुछ दे जाएं। इस पुरस्कार पाने की होड़ में न सिर्फ वे शामिल थे, जो पात्र होते हुए भी अब तक पुरस्कार पाने से वंचित रह गए थे बल्कि वे भी शामिल थे जो लक्ष्मी माता के कृपापात्र थे और प्रतिवर्ष पुरस्कार पाते रहते थे।
यह फंडा मेरी समझ से बाहर था कि लक्ष्मी माता अपने वार्षिक निरीक्षण में उन्हीं बड़े घरों को क्यों पुरस्कृत करती रहती हैं, जो सार्मथ्यवान हैं, जिनके पास इस कार्य के लिए मैन-पावर है, मनी-पावर है। उन घरों को क्यों नहीं पुरस्कृत करती, जिन्होंने अपने सीमित संसाधनों से अपने सार्मथ्य के अनुसार अपने घरों को साफ-सुथरा किया है। भई, किसी गरीब ने अपने मिट्टी के घर को चाहे गाय-भंैस के गोबर से ही सही लिपाई-पुताई की है। है तो वह घर भी साफ-सुथरा। उनके पास न तो मैनपावर है और न ही मनीपावर। यह पक्षपात क्यों?
मेरी समझ में तो यह आता है कि सार्मथ्यवान द्वारा लक्ष्मी माता को चढ़ाया गया पूजा-भेंट (गिफ्ट) एक गरीब की तुलना में काफी अधिक होता है। शायद इसीलिए लक्ष्मी माता की कृपा दृष्टि एक गरीब की तुलना में सार्मथ्यवान पर अधिक रहती है। कहा भी जाता है पैसा ही पैसे को खीचता है। जबकि मेरी समझ से ऐसा होना चाहिए था कि जो सार्मथ्यवान पिछले कई वर्षों से पुरस्कार प्राप्त कर रहे हैं उनको यदि एक वर्ष न भी दिया जाए तो उनको कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है वे तो पूजा-भेंट चढ़ाएंगे ही। इस वर्ष कुछ गरीबों को पुरस्कार प्राप्त करने वालों में शामिल कर लिया जाए तो भेंट (गिफ्ट) की संख्या में बढ़ोत्तरी की जा सकती है।
सूचना अधिकार अधिनियम के तहत लक्ष्मी माता कार्यालय से मांगी गई सूचना के आधार पर पता चला है कि देश के नामी-गिरामी सार्मथ्यवानों के धन में पिछले वर्ष की तुलना कई गुना वृद्धि हो गई है और वहीं गांव में रहने वाले गरीब किसान के धन में पिछले वर्ष की तुलना में कई गुना ह्रास हुआ है।
इस वर्ष लक्ष्मी माता के वार्षिक निरीक्षण के अवसर पर मुझ जैसे कई याचियों ने ज्ञापन देकर उनसे निवेदन किया है कि इस वर्ष उन सार्मथ्यवानों, जिनकों विगत कई वर्षों से पुरस्कृत किया जाता रहा है, की अपेक्षा हम जैसे कुछ गरीबों को पुरस्कृत करने की कृपा करें, जिससे कि हम भी धीरूभाई अंबानी बन सकें और हमारी पीढ़ियां भी आपको पूजा-भेंट चढ़ाती रहें।जय हो लक्ष्मी माता की।
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